आहार विकार

नींद में दूध पिलाना क्या है?

नींद में दूध पिलाना उन बच्चों को संदर्भित करता है, जो केवल सोते हुए दूध पीते हैं. क्योंकि दूध पिलाना उनके जागने के दौरान नहीं होता है, अतः माता-पिता बच्चे के सो जाने के लिए इंतजार करते हैं. आमतौर पर इस कार्य में प्रयोग किये जाने वाले बर्तनों में बोतलें, ड्रॉपर, और सीरिंज शामिल हैं.

नींद में दूध पिलाना एक मुद्दा क्यों है?

Sleep feedingनींद में दूध पिलाना एक चक्र है, जिसमें एक बच्चे को दूध या फार्मूला उपभोग करने के लिए  सुला दिये जाने की जरूरत होती है. इसका मतलब यह है, कि माता पिता को केवल झपकी लेने के दौरान या रात के दौरान ही बच्चे को भोजन कराना है. यह माता पिता के लिए तकलीफदेह होता है, क्योंकि उन्हें ऐसे तरीकों को ढूंढना पड़ता है, जिससे बच्चे के हर भोजन से पहले उसे सुलाया जा सके. साथ ही, उन्हें रात के दौरान कई-कई बार जागना भी मुश्किल हो जाता है.

एक ऐसा बच्चा कई बार दूध पीने के लिए सोते हुए काफी रोता है, क्योंकि भूखा होने के कारण वह सो नहीं पाता. क्योंकि ऐसे बच्चे प्रत्येक भोजन में आहार की केवल एक छोटी मात्रा ही लेते हैं, अतः वे दिन भर में आमतौर पर उधम मचाते हैं.

नींद में दूध पिलाना काफी नहीं है

जब बच्चा सो रहा होता है, तो पीना और पाचन दोनों एक बहुत ही धीमी दर पर होते हैं. एक समय में एक बूंद या एक छोटी घूँट हर बार देने के कारण भोजन का समय एक घंटा या उससे भी अधिक हो सकता है और वह भी केवल एक छोटी सी मात्रा में भोजन के लिए.

धीमी गति से पाचन उल्टी का कारण बन कर सारा खाया-पिया बाहर निकालकर आपकी घंटों की मेहनत पर पानी फेर सकता है.

बड़े बच्चे कम सोते हैं

जब बच्चे थोड़े बड़े हो जाते हैं, और बार-बार सोना बंद कर देते हैं, तब उन्हें खाने के लिए सुलाना और भी कठिन और तकलीफदेह हो जाता है. जब ऐसा होता है, तो बच्चे का वजन, अगर यह पहले से ही नहीं गिर रहा हो, तो भी, गिरना शुरू हो जाता है.

नवजात शिशुओं को नींद में दूध पिलाना

एक या दो महीने की उम्र के बच्चों को भी यह समस्या हो सकती है, क्योंकि आहार सम्बन्धी मुद्दे जन्म के समय से भी शुरू हो सकते हैं. इस कारण माता-पिता अपने बच्चे को खिलाने के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं, करने की कोशिश करते हैं.

कई बार, बच्चे के वज़न में बिलकुल भी वृद्धि नहीं होती. अच्छी खबर यह है कि नवजात शिशु बदलाव को जल्दी अपना लेते हैं, अतः इस तरह के मुद्दे इस उम्र में कुछ दिनों के भीतर ही ठीक हो जाते हैं.